शरद पूर्णिमा की रात को खीर बनाकर क्यों खुले आसमान के नीचे रखा जाता है, क्या है धार्मिक मान्यता?

 नई दिल्ली। आश्विन महीने की पूर्णिमा तिथि को हर वर्ष शरद पूर्णिमा मनाई जाती है। हिंदू धर्म में पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है। इसे कोजागरी पूर्णिमा, रास पूर्णिमा, कौमुदी व्रत या कुमार पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात को चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से युक्त होकर चमकता है। मान्यता है कि इस रात को चंद्रमा की किरणों से अमृत निकलता है। इस वर्ष शरद पूर्णिमा 25 अक्टूबर की रात को मनाई जाएगी। आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को सुबह 11:55 बजे शुरू होगी और अगले दिन 26 अक्टूबर को सुबह 9:41 बजे समाप्त होगी। ऐसे में 25 अक्टूबर की रात को शरद पूर्णिमा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ महारास रचाया था, जिसे भक्ति और प्रेम का प्रतीक भी माना जाता है। इसके अलावा, मान्यता यह भी है कि शरद पूर्णिमा की रात को माता लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं और देखती हैं कि कौन जाग रहा है। जो भी रात में जागते हैं और मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं, उन पर माता की विशेष कृपा बरसती है। रात को जागने की वजह से इसे कोजागरी व्रत भी कहते हैं। शरद पूर्णिमा की रात को कुछ परंपराएं निभाई जाती हैं। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा के अवसर पर गाय के दूध और चावल से बनी खीर को रात में खुले आसमान में रखा जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है, क्योंकि चंद्रमा की किरणें खीर पर पड़ सकें। अगले दिन सुबह इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। शरद पूर्णिमा के अवसर पर माता लक्ष्मी की स्वर्णमयी मूर्ति की पूजा की जाती है। घी के दीपक जलाकर पूरी रात जागकर मंत्रों का जप किया जाता है। इस रात को भक्त माता लक्ष्मी और भगवान श्रीकृष्ण के मंत्रों का जाप करते हैं। इस अवसर पर सफेद वस्त्र, चावल, चीनी, चांदी के बर्तन और भोजन का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

Ayush Sharma
Author: Ayush Sharma

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