बांग्लादेश में हिलसा मछली पकड़ने पर लगी रोक हटी, घटते उत्पादन से आपूर्ति को लेकर चिंता

ढाका। बांग्लादेश में हिलसा मछली पकड़ने पर लगी 22 दिनों की सरकारी रोक खत्म होने के बाद शुक्रवार तड़के मछुआरे फिर से नदियों में उतर गए। प्रजनन के मौसम में हिलसा मछलियों के संरक्षण के लिए लगाई गई यह पाबंदी गुरुवार रात 11:59 बजे समाप्त हुई। हालांकि, पिछले दो वर्षों से हिलसा के उत्पादन में लगातार गिरावट के कारण अब इसकी पर्याप्त आपूर्ति को लेकर सवाल उठने लगे हैं। बांग्लादेश के समाचार पत्र ‘द बिजनेस स्टैंडर्ड’ की शुक्रवार की रिपोर्ट के मुताबिक, चांदपुर के करीब 42,000 मछुआरों ने मेघना और पद्मा नदियों में मछली पकड़ने का काम फिर से शुरू कर दिया। रिपोर्ट में कहा गया कि कई सप्ताह की मुश्किलों के बाद मछुआरे दोबारा अपने काम पर लौटे हैं। हालांकि, अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हिलसा की उपलब्धता बंगाली समुदाय की भारी मांग को पूरा कर पाएगी। हिलसा प्रजनन के लिए समुद्र से मीठे पानी वाली नदियों की ओर पलायन करती है। इसका प्रजनन मुख्य रूप से मानसून और सर्दियों के मौसम में होता है। इसी वजह से इसकी उपलब्धता सीमित रहती है। रिपोर्ट के अनुसार, हिलसा उत्पादन में बांग्लादेश दुनिया में पहले स्थान पर है। देश अंतर्देशीय खुले जलक्षेत्र में मछली पकड़ने के मामले में तीसरे, तिलापिया उत्पादन में चौथे और कुल जलीय कृषि उत्पादन में पांचवें स्थान पर है। बांग्लादेश दुनिया के प्रमुख मछली उत्पादक देशों में भी शामिल है। एक अलग रिपोर्ट के मुताबिक, देश ने 2023-24 में 50.2 लाख मीट्रिक टन मछली का उत्पादन किया, जिसका मूल्य करीब 20.44 अरब डॉलर था। देश की जीडीपी में मत्स्य क्षेत्र का योगदान 2.43 से 2.53 प्रतिशत है, जबकि कृषि जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी 22 प्रतिशत से अधिक है। बांग्लादेश में प्रतिदिन खपत होने वाले पशु प्रोटीन का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से मिलता है। इसके अलावा, यह क्षेत्र प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 1.9 से 2 करोड़ लोगों की आजीविका का आधार है। इस बीच, हिलसा के उत्पादन में गिरावट को लेकर विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं की चिंता बढ़ रही है। बांग्लादेश के समाचार पत्र ‘प्रथम आलो’ ने इस साल सितंबर के मध्य में हिलसा की बढ़ती कीमतों के कारणों की पड़ताल की थी। रिपोर्ट में सामने आया कि पिछले दो वर्षों से हिलसा का उत्पादन और पकड़ लगातार कम हुई है। हिलसा पर शोध करने वाले एमडी अनीसुर रहमान ने उत्पादन में गिरावट के कारणों की जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि पिछले दो वर्षों से वह जो स्थिति देख रहे हैं, वह चिंताजनक है। इसके लिए उन्होंने इंसानों और प्रकृति, दोनों को जिम्मेदार ठहराया। रिपोर्ट के अनुसार, शोधकर्ताओं का मानना है कि समुद्र में बेहद बारीक जालों का इस्तेमाल, जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ना, जल प्रदूषण और पानी के भीतर मौजूद रेत के टीले हिलसा के उत्पादन में गिरावट के प्रमुख कारण हो सकते हैं। हिलसा मछली बंगालियों के लिए केवल भोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और भावनात्मक पहचान का भी हिस्सा है। गंगा-पद्मा नदी क्षेत्र के दोनों ओर रहने वाले बंगाली समुदाय में इस मछली को लेकर खास लगाव है। खासकर बांग्लादेश की हिलसा को अधिक पसंद किया जाता है। त्योहारों, पारिवारिक आयोजनों, शादियों और मौसमी परंपराओं में इसका विशेष महत्व है। कई परिवारों के लिए ताजी हिलसा का भोजन महज खान-पान नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, पहचान और पुरानी यादों से जुड़ने का माध्यम है। मछली में कांटे अधिक होने के बावजूद लोग इसके खास स्वाद के कारण इसे पसंद करते हैं। इसमें मौजूद प्राकृतिक तेल इसकी सुगंध और मक्खन जैसी बनावट को खास बनाता है। सरसों के साथ भाप में पकाई गई हिलसा, हल्के शोरबे में तैयार की गई मछली या तली हुई हिलसा अपने विशिष्ट स्वाद के लिए जानी जाती है। यही वजह है कि इसके संरक्षण के लिए प्रजनन के दौरान मछली पकड़ने पर रोक लगाई जाती है, ताकि हिलसा को प्रजनन का पर्याप्त अवसर मिल सके। हिलसा उत्पादक क्षेत्रों में प्रशासन समय-समय पर मौसमी प्रतिबंध, संरक्षित क्षेत्र और निगरानी अभियान चलाता है। इनका उद्देश्य परिपक्व मछलियों को प्रजनन के बाद ही पकड़ने की अनुमति देना है। इस साल भी प्रतिबंध के दौरान अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर अभियान चलाए। इस दौरान अवैध रूप से पकड़ी गई हिलसा मछलियों और मछली पकड़ने वाले जालों की बड़ी खेप जब्त की गई। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि प्रतिबंध लागू करना प्रशासन के लिए अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। हालांकि, इन पाबंदियों का असर मछुआरों की आजीविका पर भी पड़ा है। कई मछुआरों का कहना है कि पहले से ही हिलसा की उपलब्धता उम्मीद से कम थी और उनकी कमाई इतनी नहीं हो पा रही थी कि वे परिवार का खर्च चलाने के साथ-साथ अपना कर्ज भी चुका सकें। सरकार ने प्रतिबंध की अवधि में मछुआरा परिवारों को राहत देने के लिए खाद्य सहायता कार्यक्रम भी चलाए। इसके तहत इस साल लाखों मछुआरा परिवारों को प्रतिबंध के दौरान चावल उपलब्ध कराया गया। हालांकि, कई लोगों ने इस सहायता को अपर्याप्त बताया। इस तरह बांग्लादेश में हिलसा का मुद्दा केवल मछली के उत्पादन और आपूर्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें पर्यावरण संरक्षण और मछुआरों की आजीविका के बीच संतुलन बनाने की चुनौती भी शामिल है।

Ayush Sharma
Author: Ayush Sharma

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