पाकिस्तान: अस्पताल के शौचालय में नवजात का जन्म, स्वास्थ्य महकमे की बदहाली पर उठे सवाल

नई दिल्ली। कराची के जाने-माने अस्पताल जिन्ना पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सेंटर (जेपीएमसी) में एक महिला ने शौचालय में नवजात को जन्म दिया। इस घटना के बाद पाकिस्तान के लचर पब्लिक हेल्थकेयर सिस्टम को लेकर सवाल आक्रामक और तीखे हो गए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, इस घटना ने इलाज में बरती जा रही लापरवाही को उजागर कर दिया है। ‘द पाक ऑब्जर्वर’ की रिपोर्ट के अनुसार, इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ और इसने लेबर (प्रसव) के दौरान महिला के साथ किए गए बर्ताव पर सवाल खड़े कर दिए हैं। खबरों के मुताबिक, जांच में इस केस को डील करने में कमियां पाई गईं। इनमें यह बात भी शामिल है कि प्रसव पीड़ा के बावजूद गर्भवती को “चलने-फिरने” के लिए कहा गया और आखिरकार उसने अस्पताल के वॉशरूम में बच्चे को जन्म दिया। रिपोर्ट सवाल पूछती है कि क्या महिला की तुरंत जांच की गई थी? क्या प्रसव के दौरान देखभाल के बुनियादी नियमों का पालन किया गया था? लेबर पेन तेजी से बढ़ता है और इसके लिए तुरंत मेडिकल मदद की जरूरत पड़ सकती है, इसलिए मां और बच्चे दोनों की सुरक्षा के लिए समय पर जांच और लगातार निगरानी बहुत जरूरी होती है। इस घटना ने पाकिस्तान के सरकारी हेल्थकेयर सिस्टम की एक बड़ी समस्या की ओर भी ध्यान खींचा है। बड़े सरकारी अस्पतालों में बहुत ज्यादा मरीज आते हैं। कई मरीज सरकारी सेवा पर आश्रित होते हैं; वे प्राइवेट इलाज का खर्च नहीं उठा सकते या उनके इलाके में अच्छी हेल्थकेयर सुविधाएं नहीं होतीं। डॉक्टर, नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ अक्सर बहुत ज्यादा दबाव में काम करते हैं, जबकि भीड़ और स्टाफ व संसाधनों की कमी चुनौतियों को और बढ़ा देती है। हालांकि, हेल्थकेयर एक्सपर्ट्स और जानकारों का लंबे समय से यह कहना रहा है कि सिर्फ काम की मुश्किल स्थितियों को मरीजों की बुनियादी देखभाल में नाकामी की वजह नहीं माना जा सकता। एक्सपर्ट्स के अनुसार, मरीजों को समय पर और सही इलाज मिले, यह सुनिश्चित करने के लिए अस्पताल का बेहतर मैनेजमेंट, सही देखरेख, स्पष्ट प्रक्रिया और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी हैं। ये चुनौतियां बड़े शहरों के बाहर ज्यादा गंभीर हैं, जहां प्रशिक्षित डॉक्टर, जांच की सुविधाएं और स्पेशलिस्ट सेवाएं आसानी से नहीं मिल पातीं। गंभीर बीमारियों या गर्भावस्था से जुड़े मामलों में मरीजो को बड़े अस्पतालों (टर्शियरी-केयर हॉस्पिटल) तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है; कई बार वे तब पहुंचते हैं जब उनकी हालत और ज्यादा बिगड़ चुकी होती है और उसका इलाज करना मुश्किल हो जाता है।

Ayush Sharma
Author: Ayush Sharma

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