नई दिल्ली। भारत का तेजी से बढ़ता सेकेंड-हैंड कार बाजार शहरी प्रदूषण कम करने का एक तेज और व्यावहारिक अवसर प्रदान करता है। इसी को देखते हुए सरकार को इस्तेमाल में मौजूद पेट्रोल और डीजल वाहनों को ऑटो एलपीजी में बदलने के लिए समयबद्ध राष्ट्रीय रेट्रोफिट नीति लागू करनी चाहिए। यह मांग बुधवार को इंडस्ट्री की ओर से की गई। भारत में ऑटो एलपीजी को बढ़ावा देने वाली प्रमुख संस्था आईएसी ने कहा कि देश में हर साल सेकेंड-हैंड कारों की बिक्री करीब 60 लाख के स्तर पर पहुंच रही है, ऐसे में एक समर्पित रेट्रोफिट नीति की तत्काल जरूरत है। उद्योग संगठन के अनुसार, ऐसी नीति देश के तेजी से बढ़ते प्री-ओन्ड वाहन बाजार को वाहन प्रदूषण कम करने और वायु गुणवत्ता सुधारने का प्रभावी माध्यम बना सकती है। खासकर दिल्ली एनसीआर और अन्य प्रदूषण प्रभावित शहरों में इसका बड़ा लाभ मिलेगा। रिपोर्ट में उद्योग के अनुमानों का हवाला देते हुए कहा गया है कि सेकेंड-हैंड वाहनों का कारोबार नई कारों की बिक्री की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष 2023 में लगभग 46 लाख सेकेंड-हैंड वाहनों के लेन-देन का आंकड़ा 2030 तक 1 करोड़ से अधिक पहुंच सकता है। इस दौरान इसकी वार्षिक औसत वृद्धि दर (सीएजीआर) 12-13 प्रतिशत रहने का अनुमान है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में हर नई कार की बिक्री पर एक से अधिक पुरानी गाड़ी का स्वामित्व बदलता है। यदि भारतीय सड़कों पर चल रहे करोड़ों पेट्रोल और डीजल वाहनों में से केवल एक हिस्से को भी ऑटो एलपीजी में बदला जाए, तो वायु प्रदूषण में बड़ी कमी लाई जा सकती है। विशेष रूप से दिल्ली-एनसीआर और अन्य प्रदूषण प्रभावित शहरों में इसका बड़ा सकारात्मक असर देखने को मिलेगा। रिपोर्ट के अनुसार, इलेक्ट्रिक वाहनों और हाइड्रोजन जैसी दीर्घकालिक तकनीकों के व्यापक स्तर पर अपनाए जाने तक, रेट्रोफिटमेंट उत्सर्जन घटाने का सबसे तेज और व्यावहारिक समाधान साबित हो सकता है। आईएसी के महानिदेशक सुयश गुप्ता ने कहा, “यदि भारत ऐसे ईंधन का उपयोग करता है जो पेट्रोल की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत सस्ता है और पार्टिकुलेट मैटर, हाइड्रोकार्बन तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड (एनओएक्स) का उत्सर्जन भी काफी कम करता है, तो सड़कों पर चल रहे मौजूदा वाहनों से होने वाले प्रदूषण को तेजी से कम किया जा सकता है। इससे लाखों लोगों को बेहतर स्वास्थ्य और स्वच्छ हवा का लाभ मिलेगा, जबकि इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन जैसे दीर्घकालिक विकल्प भी समानांतर रूप से आगे बढ़ते रहेंगे।” रिपोर्ट के मुताबिक, प्रति किलोमीटर संचालन लागत के आधार पर ऑटो एलपीजी पेट्रोल से लगभग 40-45 प्रतिशत सस्ता पड़ता है। वहीं किसी वाहन को ऑटो एलपीजी में बदलने की लागत करीब 30,000 रुपए आती है, जो इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने में लगने वाले कई लाख रुपए के खर्च से काफी कम है। संगठन का दावा है कि एलपीजी से चलने वाले वाहन पेट्रोल वाहनों की तुलना में कार्बन मोनोऑक्साइड और कुल हाइड्रोकार्बन उत्सर्जन में लगभग 50 प्रतिशत तक कमी ला सकते हैं। साथ ही इनमें नाइट्रोजन ऑक्साइड (एनओएक्स) का उत्सर्जन भी काफी कम होता है और यह बीएस-VI मानकों की निर्धारित सीमा से नीचे रहता है।











