ग्रामीण ऋण व्यवस्था में एआई का इस्तेमाल बढ़ाएगा नाबार्ड, ऑन-डिमांड किसान क्रेडिट लोन मॉडल कर रहा विकसित: चेयरमैन

मुंबई। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) ग्रामीण वित्तीय सेवाओं को अधिक तेज, सुलभ और तकनीक-आधारित बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठा रहा है। नाबार्ड के चेयरमैन शाजी कृष्णन वी ने गुरुवार को कहा कि संस्था ऑन-डिमांड किसान क्रेडिट लोन उपलब्ध कराने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित मॉडल विकसित कर रही है, जिसका उद्देश्य किसानों और ग्रामीण परिवारों तक समय पर ऋण पहुंचाना तथा ग्रामीण वित्तीय प्रणाली को अधिक डिजिटल और प्रभावी बनाना है। मुंबई में आयोजित ‘ग्लोबल फिनटेक फेस्ट 2026’ के दूसरे दिन अपने संबोधन में कृष्णन ने कहा कि कृषि, मत्स्य पालन, डेयरी और अन्य संबद्ध क्षेत्रों में तेजी से डिजिटलीकरण हो रहा है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण वितरण और वित्तीय समावेशन को मजबूत करने के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि ग्रामीण वित्तीय संस्थान अब डिजिटल ऋण प्रक्रियाओं में अधिक सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं, ताकि किसानों को जरूरत के समय आसानी से वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जा सके। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा विकसित की गई डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर ने ग्रामीण और शहरी भारत के बीच की दूरी कम करने की मजबूत नींव तैयार की है। कृष्णन के अनुसार, भारत की लगभग 45 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, इसलिए देश की तेज आर्थिक वृद्धि के लिए समावेशी विकास बेहद आवश्यक है। उन्होंने कहा, “यदि भारत को तेजी से आगे बढ़ना है तो समाज के हर वर्ग का विकास जरूरी है।” नाबार्ड के चेयरमैन ने आगे कहा कि अब अगला कदम आधार जैसी पहचान प्रणालियों को आर्थिक गतिविधियों के साथ बेहतर तरीके से जोड़ना है, ताकि किसानों और ग्रामीण नागरिकों को अधिक आसानी से वित्तीय सेवाएं मिल सकें। उन्होंने कृषि क्षेत्र के लिए विकसित किए जा रहे एग्री स्टैक की भी चर्चा की। एग्री स्टैक में पहचान संबंधी जानकारी, भूमि रिकॉर्ड और फसल संबंधी डेटा जैसे विभिन्न स्तर शामिल हैं, जो कृषि क्षेत्र के लिए मजबूत डिजिटल आधार तैयार कर रहे हैं। कृष्णन ने कहा कि एग्री स्टैक के साथ एक सशक्त वित्तीय ढांचे की भी आवश्यकता है, ताकि सही समय और सही स्थान पर किसानों को उपयुक्त वित्तीय उत्पाद उपलब्ध कराए जा सकें। अपने संबोधन में उन्होंने बताया कि बागवानी, मत्स्य पालन और डेयरी जैसे क्षेत्रों में भी डिजिटलीकरण की गति बढ़ रही है। बागवानी क्षेत्र में जलवायु अनुकूलता और उत्पादों की ट्रेसबिलिटी यानी स्रोत की पहचान महत्वपूर्ण होती जा रही है, जबकि मत्स्य क्षेत्र में भी ट्रेसबिलिटी अब एक प्रमुख आवश्यकता बनकर उभर रही है। हालांकि, उन्होंने माना कि ग्रामीण वित्त क्षेत्र के सामने अभी भी कई चुनौतियां मौजूद हैं, जिनमें ऋण संवर्धन व्यवस्था, ऋण गारंटी और बीमा कवरेज से जुड़ी कमियां प्रमुख हैं। उन्होंने बताया कि भारत में अभी भी कृषि क्षेत्र में लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपए का ऋण अंतर (क्रेडिट गैप) बना हुआ है, जिसे भरना जरूरी है। कृष्णन ने आगे कहा कि कृषि ऋण स्वाभाविक रूप से अधिक जोखिम वाले होते हैं क्योंकि उनकी वापसी केवल उधारकर्ता की क्षमता पर नहीं, बल्कि मौसम, उत्पादन, प्राकृतिक आपदाओं और बाजार परिस्थितियों जैसे बाहरी कारकों पर भी निर्भर करती है। इसके बावजूद उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में कृषि क्षेत्र के गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) स्तर में कमी आई है और इसमें आगे भी सुधार की पर्याप्त गुंजाइश है।

Ayush Sharma
Author: Ayush Sharma

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