रजत मुकुट और फूलों से सजे बाबा महाकाल, भस्म आरती में शामिल होने देशभर से पहुंचे श्रद्धालु

 उज्जैन। विश्व प्रसिद्ध द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक भगवान श्री महाकालेश्वर मंदिर में आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि यानी 4 अक्टूबर 2026 को तड़के भस्म आरती का भव्य आयोजन किया गया। बाबा महाकाल के अलौकिक श्रृंगार के दर्शन के लिए मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। पूरा महाकाल परिसर ‘जय श्री महाकाल’ और ‘हर हर महादेव’ के जयकारों से गुंजायमान हो उठा। परंपरा के अनुसार, सबसे पहले भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के बाद ढोल-नगाड़ों और शंखनाद के साथ मंदिर के कपाट खोले गए। प्रातःकाल पट खुलते ही गर्भगृह में पुजारी-पुरोहितों ने बाबा महाकाल का विधि-विधान से पूजन शुरू किया। सबसे पहले प्रथम घंटाल बजाकर बाबा को हरिओम जल अर्पित किया गया। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से बने पंचामृत से भगवान का पवित्र अभिषेक किया गया। अभिषेक के बाद बाबा महाकाल का अत्यंत विहंगम श्रृंगार किया गया। पुजारियों ने भांग, चंदन और सिंदूर से बाबा को सजाया। इसके बाद मोगरे और गुलाब जैसे सुगंधित पुष्पों से विशेष श्रृंगार किया गया। बाबा महाकाल ने रजत मुकुट, अंजीर माला और भांग की माला धारण की। फूलों से बनी सुगंधित मालाएं भी बाबा को अर्पित की गईं। बाबा को फल, सूखे मेवे और मिष्ठान का भोग लगाया गया। इससे पहले महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को पवित्र भस्म अर्पित की गई और भस्म आरती शुरू हुई। जैसे ही भस्म रमाने के बाद बाबा महाकाल के दिव्य और साकार रूप के दर्शन हुए, पूरा प्रांगण भक्ति में सराबोर हो गया। झांझ-मंजीरों, ढोल-नगाड़ों और शंखनाद के बीच हुई इस आरती को देखकर हजारों श्रद्धालु भावविभोर हो उठे और हाथ जोड़कर नतमस्तक हो गए। महाकाल मंदिर की भस्म आरती की अपनी खास परंपरा और गहरी धार्मिक मान्यता है। परंपरा के अनुसार भस्म अर्पित होने के बाद ही बाबा महाकाल निराकार से साकार रूप में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। यही कारण है कि इस अलौकिक आरती में शामिल होने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु उज्जैन खिंचे चले आते हैं।

Ayush Sharma
Author: Ayush Sharma

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